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चंद रुपयों में पता चल जायेगा कि आप बाप बनने लायक मर्द हैं या नहीं

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मर्द होने के मायने अलग-अलग समय पर अलग-अलग जवाब हो सकते है। अगर आप किसी भी क्लीनिक में अपना वीर्य शीशी में भरने की कोशिशों में जुटे होते हैं तब इसकी एक मुश्किल परिभाषा से रू-ब-रू हो सकते है। इस काम को अंजाम देने के लिए आपके पास सिर्फ 15 मिनट का वक्त होता है क्योंकि पीछे लंबी कतार होती है। दीवारों पर कामोत्तेजक तस्वीरें चिपकाई होती है उसके साथ ही आपको 100 एमजी की वियाग्रा की एक गोली खिलाई जाती है।

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मकैनिकल वाइब्रेटर, लिक्विड पैराफिन और अश्लील सामग्री से भरे हुए लैपटॉप को स्खलन (इजैकुलेशन) में आपकी मदद के लिए रखा लिया जाता है। यह काम पूरा होने के बाद अपने बाप बनने की संभावना का नतीजा जानने के लिए आधे घंटे इंतजार करना पड़ता है। एक माइक्रोस्कोप आपके वीर्य की गुणवत्ता और शुक्राणुओं की संख्या की जांच करता है। जिसकी 600 रु. कीमत देकर आपको पता चलेगा कि आप बाप बनने लायक मर्द हैं या नहीं।

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बांझपंन को हमेशा से ही औरतों से जोड़ा जाता रहा है। हैदराबाद के इनफर्टिलिटी इंस्टीट्यूट ऐंड रिसर्च की डॉ. ममता दीनदयाल कहती है कि मेरे पास ऐसी महिलाएं आती है जिनके पति उन्हें प्रताडि़त करते, घर से निकालने और दूसरी शादी कर लेने की धमकी देते है। पुरुषों में बढ़ता बांझपंन अब बंद दरवाजों के पीछे पारिवारिक समीकरण को बदल रहा है। दिल्ली की वकील कामिनी जायसवाल का कहना है कि एक समय था जब तलाक के मामले अधिकतर दहेज और घरेलू हिंसा के कारण दर्ज होते थे। आज का वक्त है कि नपुंसकता और इनफर्टिलिटी की वजह से वाद दायर हो रहे है। कर्नाटक हाइकोर्ट में पिछले साल जून में एक मामला आया था जिसमें महिला ने यह कहते हुए तलाक की मांग की थी कि शादी के दो साल बाद भी वह गर्भ धारण नहीं कर सकी है और वह अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं है। जस्टिस एन.के. पाटिल और बी.वी. पिंटो ने अपने फैसले में कहा था कि पति की नपुसंकता पर सवाल उठाना जिंदगी और मौत का सवाल है।

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जिस देश में मर्दानगी का फतवा अदालतों में जारी होता हो, वहां आश्चर्य नहीं कि समस्या की जड़ पुरुषों में खोजे जाने की बजाए इसे संतानहीनता की तरफ मोड़ दिया गया है। सामान्य आबादी में इनफर्टिलिटी खासकर शहरी भारत में नाटकीय तरीके से बढ़ रही है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज का अनुमान है कि 1981 से 2010 के बीच इसमें 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। मुंबई के जसलोक अस्पताल में असिस्टेड रिप्रोडक्शन की चीफ डॉ. फिरुजा पारिख कहती है कि 15 से 20 फीसदी बेऔलाद भारतीय दंपत्तियों में अब उंगली पुरुषों की तरफ घूम गई है।

देश में संतानहीनता के 40 फीसदी मामलों में पुरुषों में इनफर्टिलिटी को जिम्मेदार ठहराया जाता है। बच्चे की चाहत अजीब रूप भी ले लेती है। ऐसा ही एक उदाहरण पिछले साल जनवरी में देखने को मिला था जब एक दंपती ने 20,000 रु. के बदले किसी हाइ आइक्यू वाले आइआइटी छात्र के शुक्रागु की चाहत का विज्ञापन दे डाला था, जिसने आइआइटी, चैन्नई के छात्रों में सनसनी पैदा कर दी थी।

मर्दों में इनफर्टिलिटी का इलाज आसान नहीं है। परीक्षण सटीक नहीं होते। वीर्य इंसानी शरीर का सबसे जटिल द्रव्य होता है जिसे इकट्टा और जमा करना मुश्किल होता है। इस क्षेत्र में सीमित ज्ञान के चलते अपर्याप्त शोध से बनी दवाइयों को बेचना भी आसान हो जाता हो जाता है।

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इनफर्टिलिटी के इलाज में मर्दानगी ही सबसे बड़ा रोड़ा है। सच मानने में पुरुषों की शर्म, उनका आत्मसम्मान और इलाज से इनकार समस्या का बोझ महिलाओं के कंधे पर डाल देता है। ऐसे अनियमित क्षेत्र में नैतिकता के किसी भी मानक का अभाव डॉक्टरों को भी संदिग्ध बना देता है। एम्स के यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजीव कुमार कहते है कि पुरुषों को सिर्फ शुक्राणु देने वाले के रूप में बरतने का एक चलन है जबकि उनकी स्वस्थ जीवनसाथी को दर्द भरे और घातक इलाज से गुजरना पड़ता है। चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों का दावा है कि उन्हें भारतीय पुरुषों में इनफर्टिलिटी के ऊंचे स्तर की जानकारी कुछ साल पहले से ही है। सवाल उठता है कि इसे सामने आने में फिर इतना वक्त कैसे लग गया। आखिरकार यह भविष्य में आने वाली पीढिय़ों का सवाल है।

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