Home लखनऊ उच्च न्यायालय एवं मण्डलायुक्त द्वारा अपात्र पाए गए पट्टा धारक

उच्च न्यायालय एवं मण्डलायुक्त द्वारा अपात्र पाए गए पट्टा धारक

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माल| उच्च न्यायालय एवं मण्डला युक्त द्वारा अपात्र पाए गए पट्टा धारको के निरस्त किये गए पट्टो को राजस्व एवं चकबन्दी विभाग के कर्मियों ने अपनी जेबें भरने के लिए पुनः पट्टा धारक बना दिया। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है।

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राजधानी की सदर तहसील के अंतर्गत आने वाले गाँव मनभौन मे सीलिंग की लगभग चालीस एकड़ भूमि पर तत्कालीन ग्राम प्रधान द्वारा वर्ष 1992-93 में लगभग चार दर्जन अपात्रो को पात्र दर्शाकर अमीर परिवारों के नाबालिग बच्चों को पट्टे कर दिए गये थे। जिसमें रामकिशोर, उदय प्रताप , संतोष कुमार, चन्द्रप्रकाश , जयसिंह,ज्ञान सिंह,ललित किशोर सहित इकतालिस लोगो सामिल है।इस पर पात्र ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज करायी थी। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए मण्डलायुक्त ने चालीस लोगो को अपात्र घोषित करते हुए पट्टे को निरस्त कर दिया था।

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निरस्त पट्टा धारको ने मण्डलायुक्त के निर्णय को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय की शरण लिया। परन्तु उच्च न्यायालय ने भी मण्डला युक्त के फैसले को जायज ठहराया। निरस्त पट्टा धारको ने गाँव मे उच्च न्यायालय के निर्णय को छुपाते हुए गाँव मे चल रही चकबन्दी की प्रक्रिया में राजस्व एवं चकबन्दी कर्मियों की मिलीभगत से लेन देन कर राजस्व अभिलेखों में अपना अपना नाम दर्ज करा लिया। वर्तमान ग्राम प्रधान राजकुमारी यादव ने निरस्त पट्टो की जमीन को पुनः सरकारी खाते में डालने के लिये मुख्यमंत्री,जिलाधिकारी सहित अन्य अधिकारियों से शिकायक की है। साथ ही न्यायालय की शरण मे जाने की भी रणनीति बनाई है।

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